Pearl of wisdom hindi-1

ज्ञान के मोती

विषय १: निंदा (Criticism)

1.

निंदक नियारे  रखिये आँगन कुटी छबाये।

बिन पानी साबुन बिना  निर्मल करे सुहाये।।


2.

बोली एक अनमोल हे जो कोई बोले जानी

हिये तराजू तोलिके तब मुख बाहर आनी।।


ऊपर दिए दोहों में निंदा के महत्व को बताया  गया है और उसी के बारे में यहाँ हम चर्चा करेगें।

यहां दूसरे दोहे को पहले दोहे के साथ दिया जाना उचित ही है क्योंकि किसी की निंदा करने के लिए बोली, वाणी या भाषा का प्रयोग तो करना ही पड़ता है।

मनुष्य ईश्वर की बनाई सबसे अनोखी रचना है। मनुष्य जो कुछ करता है जो कुछ कहता है, वो सब चीजों पर प्रभाव डालने की ताकत रखती है।

कहते हैं की मनुष्य के मुँह से निकले शब्द लोहे को भी भस्म कर सकती है, सीसे (Lead) को सोना(Gold) और रेशम(Silk) को दोधारी तलवार बना सकती है। इसी प्रकार निंदा में निकले शब्द भी बहुत प्रभावशाली होते हैं।

एक सही समझ से तो निंदा का इस्तेमाल उसके विज्ञान(Science) और मनोविज्ञान(Psychology) को जाने बिना करना वैसा ही है जैसा कि कोई हवाई जहाज को चलाने की कोशिश करना की वो चलता कैसे है। जो न केवल स्वयं के लिए बल्कि दूसरों के लिए भी खतरनाक हो सकता है।

हमारे दोहो में निंदा को सही बताया गया है। लेकिन 99% लोगों को निंदा का सही इस्तेमाल करना आता ही नहीं। जो फायदे से ज्यादा नुक्सान ही करता है। ज्यादातर लोगों को यही लगता है कि दूसरों की खराबियों को, गलतियों को या गलत आदतों को सुधरने के लिए उनकी निंदा करना और आलोचना करना, डांटना या उलाहने देना ही सही तरीका है जो कि सही नहीं है।

विश्वप्रशिद्ध मनोविशेषज्ञ श्री बी. एफ. स्किनर(B. F. Skinner) ने अपने प्रयोगों से यह सिद्ध कर दिया था कि जिन जानवरों को उनके सही व्यवहार के लिए इनाम दिया जाता है वो उन जानवरों के मुकाबले ज्यादा जल्दी सीखते हैं और याद रखते हैं जिन्हे उनके गलत व्यवहार के लिए दण्ड दिया जाता है।

बाद के प्रयोगों ने यह साबित कर दिया की ऐसा ही मनुष्यों के साथ भी होता है। लोगों की निंदा करके हम लोगों में हमेशा रह सकने वाले बदलाव नहीं कर सकते बल्कि उनमे नाराजगी और क्रोध ही बढ़ाते हैं।

निंदा का मनोविज्ञान आज बहुत विकसित हो गया है। निंदा को दो प्रकार से विश्लेषित किया गया है। एक तो रचनात्मक(Constructive) निंदा और दूसरा विनाशकारी(Destructive) या अरचनात्मक निंदा। पहले तरह की निंदा से रचनात्मक असर होता है दूसरे तरह की निंदा से विनाशकारी असर।

 अफ्रीका के जंगलों में एक जनजाति रहती है जिसके लोगों को जब पेड़ की लकड़ी चाहिए होती है तो वे पेड़ गिराने के लिए  कुल्हाड़ी या किसी और औजार का इस्तेमाल नहीं करते बल्कि वे एक ऐसे पेड़ की तलाश करते हैं जो थोड़ा बहुत भी सुख हो। फिर वे लोग अपने पुरे परिवार के साथ वहां जाते हैं और उस पेड़ के चारों तरफ खड़े हो जाते हैं और पेड़ को देखते हुए कहते हैं कि तू तो सुख हुआ पेड़ है और एक दिन यहीं गिर जायेगा। और बहुत ही निंदा से भरी हुई बातें उस पेड़ से कहते। ऐसा वे कई दिनों तक करते जबतक की वो पूरी तरह सुख नहीं जाता। और फिर किसी दिन जरा तेज हवा से वो पेड़ गिर जाता है। 

ये उदाहरण है निंदा का अरचनात्मक या विनाशकारी असर का। यही असर मनुष्यों पर भी होता है। निंदा किसी के जीवन को अंधे कुए में धकेल भी सकती है। निंदा एक ऋणात्मक क्रिया है जिसका अधिकतर खतरनाक  असर होता है। हो सके तो निंदा या आलोचना करने से हमेशा बचना चाहिए।

निंदा का रचनात्मक असर भी होता है। लेकिन ऐसे असर  लिए बहुत सावधानी की जरूरत होती है जैसे रसोई वाली छुरी के साथ सावधानी रखते हैं। ऐसी निंदा ऐसे की जनि चाहिए जैसे दान किया जाता है। जिस प्रकार जब दान करते है तो घृणा, क्रोध, द्वैष, आदि ऋणात्मक एहसासों को मन से निकाल देते हैं और प्रेम तथा पूरी सच्चाई के साथ करते हैं। किसी की निंदा करते वक्त ऐसे सावधानी रखनी चाहिए जैसे शरीर की सफाई करते समय प्रहार मैल पर किया जाता है न की शरीर पर। 

पहला भाग समाप्त। 

दूसरा भाग जल्दी ही प्रकाशित किया जाएगा।

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